Thursday, March 17, 2016

Art of Living is most dangerous wing of RSS

"आर्ट ऑफ़ लिविंग" आरएसएस का खतरनाक विंग

(डॉ परम आनंद द्वारा २००५ में मराठी में लिखा गया लेख, जिसे महाराष्ट्र के आम्बेडकारी वृत्त्पत्रों ने भी छापने से इंकार कर दिया था. केवल विश्वसम्राट इस वृत्तपत्र ने छापा था)

      
       इस जगत के तरुण सुनिश्चित एवं योग्य नेतृत्व के अभाव में 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' जैसी अध्यात्मिक संस्थाओं की ओर आकर्षित होते है. इन संस्थाओं के मुख्य गुरु देखने के लिए आकर्षक और मधुर वाणी के स्वामी होते है. उनकी वाणी मंत्रमुग्ध करने वाली होती है. साथ ही मनमोहक संगीत में रचे भजन एवं गानों का उनमें भरना किया जाता है. सभी धर्मों की नेतृत्वहिन् जनता इनसे मोहित होती है. इसी प्रकार की एक संस्था है "आर्ट ऑफ़ लिविंग" (ए.ओ.एल.). यह संस्था दुनिया की सबसे बड़ी अशासकीय संस्था है. ए.ओ.एल. में सर्वप्रथम एक बेसिक कोर्स करवाया जाता है, जिसमें मानवतावादी विचार, सर्वधर्म समभाव और सभी धर्मो के उच्च ज्ञान के विचारों को प्रसारित किया जाता है. इसमें करवाया जाने वाला योगा और ध्यान स्वाभाविक रूप से मन को शांत करने वाला और शरीर को स्फूर्ति देने वाला होता है. प्राणायाम और सुविचारों के संयोग से मन प्रफुल्लित होता है.

       इसमें कराई जाने वाली सुदर्शन क्रिया यह एक अलौकिक असामान्य अनुभव है. सुदर्शन क्रिया रविशंकर का खुद का मूल शोध ना होकर योगासन का एक भाग है. इसमें श्वास को तेज, मध्यम और निम्न करके एक प्रकार से फेफड़ों का व्यायाम किया जाता है. अन्य दो-तिन प्रकार के योगा के व्यायाम जैसे हाथों को कमर और छाती पर रखकर उज्जयि साँसे, भ्रस्तिका प्राणायाम कराने के बाद यह सुदर्शन क्रिया (व्यायाम) कराई जाती है. व्यायाम का एक सेट पूरा करने के बाद जब निचे लेटकर शवासन किया जाता है तब शरीर और मष्तिष्क में संचारित तरंगों के कारण एक अदभुत अनुभव का साक्षात्कार होता है. मनुष्य को खुद का शरीर हवा में उड़ता हुआ जान पड़ता है. रविशंकर की सुदर्शन क्रिया का यह प्रकार वैसा ही है, जैसे कि कोई व्यक्ति दौड़ते समय अगर कही पर अपनी गति को तेज और निम्न करे और अंत में आराम करने के लिए जमीन पर लेट जाए, तो जो अनुभव उसे होगा वही अनुभव सुदर्शन क्रिया से होगा. लेकिन सुदर्शन क्रिया का अनुभव बहुत ही तीव्र प्रकार है. वास्तव में साँस को तेज, मध्यम और निम्न करने के व्यायाम का उल्लेख बौद्ध साहित्य में भी है. मेरा यह अनुमान है कि ब्राह्मणों ने जब नालंदा का बौद्ध विश्वविद्यालय अलाउद्दीन खिलजी के हाथों १३वि सदी में जला दिया था, तब उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बौद्ध आयुर्वेदिक, योगा, और अन्य ज्ञान की किताबों को अपने साथ चुराकर छुपा दिया था, और अब वे धीरे धीरे एक एक कर ज्ञान की बातों को बहार निकाल रहे है. ब्राह्मणों द्वारा नालंदा के विश्विद्यालय की किताबों को चुराकर अपने साथ ले जाने का उल्लेख कई जगहों पर मिलता है.

       लेकिन ब्राह्मण रविशंकर ने इस सुदर्शन क्रिया को अपनी खोज बताकर इस प्रक्रिया अथवा व्यायाम को दैविकता का चमत्कार बताया है और खुद को भगवान् भी कहा है. इस प्रकार का प्रचार भी उनके शिष्य हर समय करते रहते है. कई लोग रविशंकर को ही सबसे बड़ा भगवान् मानते है, अर्थात शिवजी का रूप मानते है.

       दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आर्ट ऑफ़ लिविंग में "सो हम" को सर्वोच्च मन्त्र बताया गया है. इसे भी रविशंकर की देव वाणी या खोज बताया गया है. लेकिन "सो हम" यह मन्त्र बुद्ध अनुयायी संत रविदास के दोहे में बड़े पैमाने पर पाया जाता है (पढ़े बुद्ध अनुयायी संत रविदास, सम्यक प्रकाशन, दिल्ली). सो हम यह पंजाबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'हम अच्छे है'.


       कुछ बौद्ध लोग रविशंकर की सुदर्शन क्रिया को गोयंका गुरूजी के विपस्सना का ही चुराया हुआ स्वरूप बताते है. लेकिन यह गलत है. विपस्सना और सुदर्शन क्रिया में कोई भी संबंध नहीं है. वैसे विपस्सना के ध्यान, आनापान सत्ती को भी 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' में सीनियर स्टेज पर सिखाया जाता है, जिसे 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' में 'एडवांस कोर्स' के नाम से जाता है. 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' में यह चार दिन का शिबिर होता है, जिसमे मौन और ध्यान होता है. लेकिन सुदर्शन क्रिया और विपस्सना पूरी तरह से अलग है. इस कोर्स में ही साधकों को मानसिक रूप से कमजोर कर धर्मांध किया जाता है. एकतरफ सर्वधर्म समभाव कहा जाता है और सभी प्रवचनों भाषणों में वेद और उपनिषद से ही सारे धर्मो की उत्पत्ति रटाई जाती है. रविशंकर खुद पुराण और वेदों पर विशवास मजबूत करने की बात करता है और हर भाषण में उनकी स्तुति करता है.

       वसई के इंजीनियरिंग क्षेत्र में एक उच्च शिक्षित युवा का अनुभव यहाँ दिया जा रहा है. यह बौद्ध युवा उच्चशिक्षित होकर उच्चपदस्थ है. ए.ओ.एल. से वह पूरी तरह से जुड़ गया था. ए.ओ.एल. का उसने डी.एस.एन. (दिव्य समाज का निर्माण) और एडवांस कोर्स भी किया. डी.एस.एन. के चार दिन के रहिवासी कोर्स में शिविरार्थी को ए.ओ.एल. का प्रचार बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन, भीड़ की जगहों पर लोगों में जाकर दिन भर करना होता है अर्थात दिव्य समाज का निर्माण अर्थात ही ब्राह्मणी गुलाम समाज के निर्माण में पूरी आस्था से हात बटाना होता है.

       एडवांस कोर्स में उस युवा को एक संशयास्पद अनुभव आया. कोर्स के अंत में आखरी समारोपीय सभा में शिक्षक ने रामजन्मभूमी का प्रश्न उपस्थित किया. सुदर्शन क्रिया के अदभुत अनुभव के कारण ए.ओ.एल. के अनुयायी उनके भक्त हो जाते है. प्रारंभ में सर्वधर्म समभाव की गप लगाने वाले ए.ओ.एल. के कार्यक्रम में रामजन्मभूमी का विषय रखना समाज को भड़काने वाली बात थी. देश में आतंक और दंगा फैलाने का वातावरण निर्माण करने वाली बात थी. इस घटना पर से ही उस युवा को ए.ओ.एल. के खतरनाक हिंदुत्ववादी होने के संकेत मिल गए थे. लेकिन फिर भी उसने सोचा कि शायद वह शिक्षक का अपना व्यक्तिक विषय हो. ए.ओ.एल. के अन्य फायदों (मनशांति, प्रफुल्लता) की वजह उसने इस घटना को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन उसके मस्तिष्क में सवालों ने घर कर लिया था. जैसे कि रविशंकर को भगवान् मानना, शिक्षक और रविशंकर को शादी की छुट होना आदि. इतना ही नहीं तो कुछ शिक्षकों के प्रेम प्रकरण होकर शादियाँ भी हुयी थी.

            एक दिन महाराष्ट्र में महाड नामक जगह पर ए.ओ.एल. का एक बड़ा सत्संग आयोजित किया गया था. यह युवा महाड का चवदार तालाब देखने की आशा से अपने परिवार के साथ वहां गया. वहाँ फिर एक दूसरा अनुभव आया. वहाँ शामको सत्संग के पहले कश्मीर में ब्राह्मण पंडितों पर मुस्लिमों द्वारा हो रहे अत्याचारों की एक डॉकुमेंट्री बताई गयी. इस युवा को एक बात खटकी, वह थी उस डोकुमेंट्री में ब्राह्मणों के इंटरव्यूह बताये गए थे लेकिन किसी भी मुसलमान का इंटरव्यूह नहीं लिया गया था, या उन्हें नहीं पूछा गया था कि वे ब्राह्मणों पर क्यों अत्याचार कर रहे है. इस युवा को पूरी जानकारी थी कि कश्मीर में आरएसएस या विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा मुस्लिमों पर भी अत्याचार किये जा रहे थे. वहाँ की मिलिट्री पूरी तरह से आरएसएस द्वारा संचालित है.

       यह युवा ए.ओ.एल. के सिस्टम के अनुसार खुद रविशंकर द्वारा लिए जाने वाले एडवांस कोर्स करने के लिए बेंगलुरु के मुख्यकेंद्र में गया. वहाँ पर नैसर्गिक वातावरण के साथ ही सुन्दरता पूर्वक तयार किया गया परिसर, बनाई गयी इमारते, ध्यान साधना केंद्र बहुत ही मनमोहक है. केंद्र के प्रवेश द्वार के अंदर ही गौतम बुद्ध की बहुत ही सुंदर ध्यानस्थ मूर्ति रखी गयी है. कुछ विदेशी लोग भी यहाँ कोर्स के लिए आते है. इस जगह पर एक महत्वपूर्ण घटना घटी. गुरूजी हाल ही में बांग्लादेश से लौटे थे. उन्होंने आते ही सभा को संबोधित किया. गुरूजी ने जो कहा उसका मुख्य भाग ये था, "मै कल ही बांग्लादेश से लौटा हूँ. मै जब बांग्लादेश में था, तो लोहों ने कहा कि भारत ने बांग्लादेश में बम स्फोट करवाए है. क्या आप जानते है कि, वे किस तरह से भारत की बदनामी कर रहे है? कितना भला बुरा कह रहे है ?"   यह भाषण करते समय गुरूजी की बेचैनी स्पष्ट रूप से झलक रही थी. अब यहाँ ये सवाल आता है कि, गुरूजी को उनके अनुयायी जगतगुरु कहते है और वे भी खुद को जगतगुरु कहलवाते है, तब उन्हें दुनिया के सारे देश समान रूप से प्रिय होने चाहिए. सभी देशों को उसने अपने छोटे छोटे बच्चे समान देखना चाहिए, जो हमेशा आपस में हर समय झगड़ते रहते है. फिर ऐसे जगतगुरु ने केवल भारत के प्रति व्यथित होना, संशयास्पद है. उसके भाषण से यह स्पष्ट होता है कि उसे भारत के लोगों को बांग्लादेश के विरुद्ध भड़काना है.

       इसके अलावा कई शहरों में ए.ओ.एल. की रहिवासी आश्रम शालायें भी है. वहाँ विभिन्न धर्म के छोटे बालक पढने के लिए भेजे जाते है. यहाँ पर वेदों पर आधारित शिक्षण दिया जाता है. और विशेष यह है कि इन शालाओं में लड़कियों को पढने पर पाबन्दी है. अगर ए.ओ.एल. यह एक सर्वधार्मिक संस्था है तो वहाँ सभी धर्म का संयुक्त शिक्षण दिया जाना चाहिए. उस युवा के लिए सभी धर्म के लोग आदरणीय है और उनके धर्म भी. स्त्रियों को शिक्षापाबन्दी यह पूरी तरह से मनुवादी सोच है.
      
       अब ए.ओ.एल. की हिंदुत्व कट्टरता के कई अनुभव इस युवा को आने लगे थे. उनके अनुयायी तो रविशंकर को इस हद तक भगवान् मानते थे कि वो कही भी बरसात भी करवा सकता है. अगर ये सच होता तो भारत की राज्यों में सुखा नहीं पड़ता और किसान आत्महत्याएं नहीं करते. और भी कई अचरज भरे चमत्कारों के किस्से लोगों में फैलाये जाते है जैसे रविशंकर की जटा में से हीरे मोती झड़ते है. लेकिन ध्यान और सुदर्शन क्रिया का प्रभाव इस कदर होता है कि शिबिरार्थी रविशंकर का भक्त ही नहीं तो अंधभक्त बन जाता है. कई शिबिर में तो इस तरह बताया जाता है कि कोर्स और उनके क्रियाकलापों से संबंधित कोई भी सवाल नहीं करने चाहिए, ऐसा करना रविशंकर पर अविश्वास दर्शाता है. जो भी करवाया जा रहा है उसे रविशंकर अर्थात भगवान् का आदेश समझा जाये. और वास्तव में शिबिरार्थी ऐसी कसम भी खाते है. एक शिबिर के दरम्यान इस युवा ने कोर्स आयोजक से एक सवाल किया, "सर ये गुरूजी केवल बाई ओर की हथेली से प्राणायाम क्यों करवाते है. शरीर का पूर्ण व्यायाम होने के लिए दोनों हाथों से प्राणायाम करने चाहिए." तब उस कोर्स का आयोजक जो एक ब्राह्मण है और उस युवा का मित्र भी, उसने कहा कि, "गुरूजी जो भी कहते है वह भगवान् की इच्छा है. गुरूजी अगर हमें आदेश दे किसी के खिलाफ तलवार उठा ले तो तलवार उठाकर वार करने चाहिए." उस कोर्स आयोजक को ज्ञात था कि वह युवा बौद्ध है. यहाँ स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण किस तरह से भारत के लोगों को भड़का रहे है.  

           
       ए.ओ.एल ने बेंगलुरु में २००६ में १६ से १९ फरवरी को एक जागतिक संमेलन आयोजित किया था. दुनिया के लगभग सभी देशों के प्रतिनिथि वहाँ उपस्थित किये गए थे. और इस संमेलन में २५ लाख लोग अर्थात अनुयायी भी आये थे. बहुत ही भव्य कार्यक्रम था. भारत के राष्ट्रपति, कई मुख्यमंत्री भी उपस्थित थे. दुनिया का सबसे बड़ा संमेलन कहा गया था. यह संमेलन और आयोजन भी अदभुत था. स्टेज पर २००० लोग बैठ सकते थे. ५०० तबला वादक थे. लेकिन किसी भी देश के प्रतिनिधि ने उनके देश की समस्या दूर करने के लिए या गरीबी दूर करने के लिए ए.ओ.एल. के जरिये से कुछ फायदे हुए है ऐसा कुछ भी नही बताया. योग और ध्यान से तो मन प्रफुल्लित होता ही है यह सभी ने कहा यह कोई नयी बात नहीं थी. और इस कार्यक्रम के आमंत्रण पत्र भले ही रविशंकर के नाम से बांटे गए होंगे लेकिन इस संमेलन में आमत्रित प्रतिनिधियों से रविशंकर के व्यक्तिक संबंध हो ऐसा नहीं लगता.

       उसीप्रकार २००६ में २० से २४ ओक्टोबर दरम्यान मुंबई के बांद्रा स्थित बीकेसी ग्राउंड पर एक भव्य प्राणायाम शिबिर आयोजित किया गया था. इस शिबिर में खुद रविशंकर उपस्थित होने वाले है यह जानकर २ लाख लोग उपस्थित हुए थे. यह शिबीर संस्कार और आस्था चैनल पर सीधा प्रक्षेपित किया जा रहा था. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख, प्रसिद्द गायक हरिहरन, किमी काटकर, पद्मिनी कोल्हापुरे, सुनिल शेट्टी जैसे कई सेलेब्रेटी भी उपस्थित थे. इस शिबिर में भी प्राणायम ध्यान करने के बाद उपस्थितों से उनके मानस पूछे गए. इस शिबिर में जिन मुस्लिम महिलाओं ने बुरखा डालकर अपना मनोगत व्यक्त किया था वे हिन्दू महिलाये ही थी, जिन्होंने ए.ओ.एल. की खूब तारीफ की थी. एक सिख महिला ने गुरूजी की प्रशंसा में कहा कि उसे गुरूजी में गुरुग्रंथ साहिब दिखाई देते है. इसपर गुरूजी का उत्तर था, 'गुरु ग्रंथ साहिब महान है और उसमे वेद और उपनिषद का ही निचोड़ है'. यहाँ पर स्पष्ट करना चाहूँगा कि गुरु गोविन्द साहब और गुरुनानक देव ने वेद उपनिषद पढ़े थे या नहीं यह तो दूर की बात है लेकिन उन्होंने उनकी निंदा की है. इसी शिबिर में गुरूजी ने कहा कि हिन्दू धर्म ही जातिधर्म की समस्या को दूर कर सकता है. आगे उसने कहा कि, "विदेशों में पैर को गाली के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. 'माई फूट' नामक गाली दी जाती है, लेकिन भारत में पैर को भी सन्मान दिया जाता है और पूज्यपाद कहा जाता है". यहाँ पर गुरूजी ने सीधे सीधे ब्राह्मणी वर्ण व्यवस्था की जयजयकार की है. वर्ण व्यवस्था में पैर की जगह पर शूद्रों को रखा गया है. ऐसा गुरु दुनिया का क्या किसी एक गाव बस्ती का भी उद्धार नहीं कर सकता. इन सारी बातों से यह पूरी तरह से स्पष्ट होता है कि "आर्ट ऑफ़ लिविंग' यह आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद् की एक शाखा है, जो लोगों को ध्यान, सुदर्शन क्रिया के माध्यम से कुछ भी करने के लिए तैयार करती है और इसलिए यह आरएसएस की एक खतरनाक शाखा है सिद्ध होता है.


       आखिर सभी बातों का दिमाग में उद्रेक होकर बांद्रा के इस शिबिर में इस युवा ने आयोजकों से माइक आपने हाथ में माँगा और गुरूजी से सीधा सवाल किया, "संस्कार और आस्था वाहिनी पर दिखाये जाने वाले सभी कार्यक्रम आरएसएस और व्ही.एच.पी. द्वारा ही प्रेरित होते है. उसमे केवल हिन्दू धर्म की ही बातें बताई जाती है. आप भी यह कहते हो कि हिन्दू धर्म ही सर्व श्रेष्ठ है और सभी धर्म हिन्दू धर्म में से ही आये है. लेकिन सच तो यह है कि हर व्यक्ति को अपना धर्म सबसे प्यारा होता है. उसका धर्म वही होता है जो उसके माँ बाप का होता है. आदमी पर उसके धर्म के संस्कार उसके जन्म से पहले से चालु हो जाते है. जन्म के बाद तो उसे उसके धर्म में इसकदर डूबा दिया जाता है कि वह जीवनभर उस धर्म में से बाहर नहीं आता और मरता भी उसी धर्म में है. धर्म और जात यही विषय उसके जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पसंदीदा और नजदीकी बातें होती है. व्यक्ति २०-२५ की उम्र के दरम्यान अपने धर्म का विश्लेषण भी करता है, कि उसका धर्म अन्य धर्मों की तुलना में कैसा है. और जब वह पाता है कि उसका धर्म ही ठीक है तो  वह धर्म के विषय को वही पर छोड़ देता है और उसी धर्म में चाहत-बेचाहत ही नहीं तो लड़ते-झगड़ते जीता है और उसीमें मरता भी है. लेकिन दुनिया में करोड़ो में ही नहीं तो अरबों में कोई ऐसा होता है जो अपना धर्म बदलता है या फिर नये धर्म की स्थापना करता है. लेकिन आप हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ कहते हो, ये आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद् का कार्य है. कही आपका उनके साथ ही संबंध तो नहीं ?." इसपर गुरूजी ने जवाब दिया कि, "ऐसा कुछ नहीं है. आप ऐसा क्यों सोचते हो? आर्ट ऑफ़ लिविंग का सभी से संबंध है, कांग्रेस से भी है और बीजेपी से भी है." लेकिन गुरूजी ने यह नहीं बताया कि उसके आरएसएस के साथ संबंध है या नहीं. यह सारा संभाषण टीवी पर कई लोग पूरी दुनिया में देख रहे थे. उस युवा को उसके समबंधियो, कार्यालय के लोग और मित्रों के फ़ोन आये थे.

       और इस युवा के सवाल का परिणाम ऐसा हुआ कि सभी बैठे लोगों में हलचल मच गयी. शायद लोग डर गए थे. लोग उठकर धीरे धीरे बाहर निकलने लगे थे. लगभग कार्यक्रम ही समाप्त हो गया.

       ए.ओ.एल. यह संघटन किस तरह से धोकेबाज यह जाने. एक बार बेंगलोर के आश्रम के आसपास किसी ने गोलीयां चलाये जाने का आरोप किया गया था. हमें तो पूरा विश्वास है कि प्रसिद्धि के लिए यह काम ए.ओ.एल. का ही है. और मजे की बात तो यह है कि भगवान रविशंकर भी इस गोलियों से डर गया था. उसने वक्तव्य दिया कि उसने मारने के प्रयत्न हो रहे है और उसकी जान को खतरा है. २००० साल के दरम्यान बेंगलुरु के आश्रम के पास से ही उनकी मालकी की जमीन पर से पैसे छापने वाली मशीन बरामद की गयी थी. अभी मार्च २०१६ के ए.ओ.एल. के अंतर्राष्ट्रीय संमेलन में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये गए है. शायद ये पाकिस्तान गए ब्राह्मण के वंशज है. क्योंकि भारत के पार्लियामेंट की इमारत पर हमला करने वाला पकिस्तान का अफजल गुरु मूलतः ब्राह्मण था. लेरी और कॉलिंस ने लिखी किताब "फ्रीडम एट मिडनाइट" में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत की स्वतंत्रता की रात १४ अगस्त १९४७ को करीब ५०० आरएसएस के ब्राहमण पाकिस्तान चले गए थे. पाकिस्तान में आईएसआई को ये ब्राहमण लोग ही चलाते है. इन्होने वहां पर मुसलमान धर्म लिया हुआ है. आई एस आई और आरएसएस एक दूसरों को पूरी मदत करते है इसका सबूत 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' पेपर में छपा था. यही पाकिस्तान के ब्राहमनी मुसलमान 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' में अनुयायी होने चाहिए. पूरी दुनिया में आरएसएस का नेटवर्क है, जो आर्ट ऑफ़ लिविंग को बढाने में पूरी मदत करता है.

        
       भारत और विदेशों में भी सभी विभागों में इनके लोग है. आर्ट ऑफ़ लिविंग के मेम्बर को अच्छे पदों पर आसनस्थ किया जाता है. पूरी ब्राह्मणी व्यवस्था उसके पीछे खड़ी की जाती है. लेकिन विरोध करने पर उसे जमीन पर फेंक दिया जाता है. इस रविशंकर महाराज के बारे में गोयंका गुरूजी ने जो बेचैनी जाहिर की है वह आश्चर्य कारक है क्योकि गोयंका गुरूजी को रविशंकर एक प्रतिद्वंदी की तरह नजर आने का जाहिर होता है, यह एक दूसरा विषय है. लेकिन इसपर रविशंकर की कही भी कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती है. जिस प्रकार रविशंकर को उसके अनुयायी भगवान् का दर्जा देते है उसीप्रकार गोयनकाजी को उनके अनुयायी  बोधिसत्व, या बुद्ध का दर्जा देते है.

      
       ए.ओ.एल. में डूबे एक व्यक्ति की पत्नी ने अपनी सौतन का प्रेमपूर्वक स्वीकार किया है. काँची का स्त्रीलंपट और हत्या प्रकरण में अटका हुआ और एक दूसरा जगतगुरु शंकराचार्य गुरूजी के साथ दशहरा उत्सव में शामिल था. अक्टूबर २००५ को बांद्रा में ही आयोजित गुरूजी के उपस्थिति में एक अन्य ४ दिवसीय संमेलन में इस स्त्रीलंपट जगतगुरु की मदत के लिए एक बड़ा स्टाल लगाकर हर एक अनुयायी से जबरदस्ती हस्ताक्षर लिए जा रहे थे.

       ए.ओ.एल. का जाल १४५ से भी अधिक देशों में फैला है क्योंकि प्रत्येक देश में भारत का एक राजदूत होता है और जब वह आरएसएस या व्ही.एच.पी. का मेम्बर होता है तब वह इस ए.ओ.एल. को वहां पर बढाता है. रविशंकर कई अन्य धर्मों के धर्मगुरुओं से भी मिला है. उसीप्रकार अलकायदा और अन्य आतंकवादी संघटनों के अध्यक्षों से भी मिले है. लेकिन उनमें क्या वार्ता की गई यह कभी भी बताया नहीं गया. चर्चा का चित्रिकरन देखने को मिलता है लेकिन चर्चा सुनने को नहीं मिलती. इन सभी मुलाकातों को रविशंकर की महत्ता मानी जाये या उन अन्य धर्मगुरुओं की या आतंकवादी संघटनो के अध्यक्षों की या फिर उनकी जो इन मुलाकातों को घटित करवाते है.

       ए.ओ.एल. अब सभी प्रमुख शहरों और भारत के कोने कोने में अपने अस्तित्व को फैला रही है. उसकी सुदर्शन क्रिया अत्यंत प्रभावशाली है और उसके माध्यम से सम्मोहित होकर बहुत सारी जनता आकर्षित हो रही है. एकबार ए.ओ.एल. में पड़ने के बाद उसमे से निकलना बेहद कठिन है. इसके लिए आम्बेडकरवादी और मानवतावादी विचारों की जनता ने तुरंत जनजागृति करके भारतीय समाज को इस ब्राहमणवादी चक्रव्यूह में फसने से बचाना जरुरी है.




डॉ परम आनंद,
राष्ट्रीय प्रमुख,
भारत लेनी संवर्धन समिति (ब्लिस)
८८०५४६०९९९